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शांति चाहिए तो $1 बिलियन निकालिए! ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्लान ने दुनिया को चौंकाया
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वॉशिंगटन/नई दिल्ली: क्या दुनिया में ‘शांति’ खरीदने की भी कोई कीमत होती है? अगर आप अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप से पूछें, तो जवाब है—हाँ, और वो कीमत है 1 अरब डॉलर (करीब 8,400 करोड़ रुपये)!
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हाल ही में सामने आई मीडिया रिपोर्ट्स ने दुनिया भर के कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। खबर है कि डोनाल्ड ट्रंप मध्य पूर्व (Middle East) में शांति स्थापना के लिए एक विशेष ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) बनाने की योजना बना रहे हैं, लेकिन इसमें शामिल होने की शर्त बेहद चौंकाने वाली है।
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क्या है 1 अरब डॉलर वाला ‘एंट्री टिकट’?
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टाइम्स ऑफ इंडिया और द अटलांटिक की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप की टीम एक ऐसा प्रस्ताव तैयार कर रही है जिसमें देशों को इस ‘बोर्ड’ का सदस्य बने रहने के लिए भारी-भरकम फीस चुकानी होगी।
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इस प्लान के तहत:
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- बोर्ड में शामिल होने वाले देशों को सदस्यता शुल्क के तौर पर $1 बिलियन (एक अरब डॉलर) देने होंगे।
- यह पैसा एक तरह की ‘एंट्री फीस’ या ‘सबस्क्रिप्शन’ जैसा होगा।
- आलोचक इसे कूटनीति से ज्यादा एक ‘बिजनेस डील’ या ‘Pay-to-Play’ (पैसे दो और खेलो) मॉडल बता रहे हैं।
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सिर्फ गाजा नहीं, पूरा मिडिल ईस्ट है निशाने पर
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अल जजीरा और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बोर्ड का एजेंडा सिर्फ इजरायल-हमास युद्ध या गाजा तक सीमित नहीं है। ट्रंप का यह ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पूरे मिडिल ईस्ट के जिओ-पॉलिटिकल ढांचे को बदलने का सपना देख रहा है।
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लीक हुए दस्तावेज़ों (Charter) से पता चलता है कि:
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- यह बोर्ड ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ (Abraham Accords) की तर्ज पर अरब देशों और इजरायल के बीच रिश्तों को सामान्य करने पर जोर देगा।
- बोर्ड के सदस्यों का कार्यकाल 5 साल का हो सकता है, जिसे बाद में रिन्यू किया जा सकेगा।
- इसका उद्देश्य गाजा के पुनर्निर्माण के साथ-साथ क्षेत्र में नए सुरक्षा समीकरण बनाना है।
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दुनिया क्यों है हैरान?
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आमतौर पर संयुक्त राष्ट्र (UN) या अन्य शांति संगठन स्वैच्छिक योगदान पर चलते हैं, लेकिन किसी “बोर्ड” में बैठने के लिए 1 अरब डॉलर की मांग करना आधुनिक कूटनीति में एक अभूतपूर्व कदम है। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप इस कदम के जरिए अमेरिकी करदाताओं (Taxpayers) के पैसे बचाकर, अमीर खाड़ी देशों (Gulf Nations) के पैसों से क्षेत्र को कंट्रोल करना चाहते हैं।
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निष्कर्ष: कूटनीति या कारोबार?
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फिलहाल यह प्रस्ताव अभी कागजों पर है, लेकिन इसने ट्रंप की विदेश नीति (Foreign Policy) की झलक दिखा दी है। सवाल यह उठता है कि क्या दुनिया के देश शांति के नाम पर ट्रंप की इस ‘महंगी दुकान’ में खरीदारी करने को तैयार होंगे? या फिर यह प्लान शुरू होने से पहले ही विवादों में घिर जाएगा?
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(यह खबर अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है।)
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