A new East India Company rising? Rubio’s speech signals US colonial aspiration – India Today

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{“result”:”निश्चित रूप से, यहाँ दी गई खबरों के आधार पर एक वायरल हिंदी न्यूज़ आर्टिकल है। यह एक अनुभवी रिपोर्टर की शैली में लिखा गया है जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की गहराई को समझता है।nn***nn

सावधान! क्या America बन रहा है नई ‘East India Company’? Rubio के बयान ने दुनिया को दिया खतरे का सिग्नल

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नई दिल्ली/म्यूनिख: क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है? क्या 21वीं सदी में दुनिया एक नए तरह के ‘साम्राज्यवाद’ (Colonialism) की आहट सुन रही है? म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (Munich Security Conference) में अमेरिकी विदेश मंत्री (Secretary of State) मार्को रुबियो (Marco Rubio) के हालिया भाषण ने पूरी दुनिया, और खास तौर पर यूरोप में खलबली मचा दी है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका अब एक “सहयोगी” नहीं, बल्कि एक नई ‘East India Company’ की तरह व्यवहार कर रहा है।

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रुबियो का यह भाषण केवल कूटनीतिक नहीं था, बल्कि इसमें छिपी थी एक खुली चेतावनी। आइए डिकोड करते हैं कि आखिर अमेरिका की इस नई ‘MAGA’ नीति का दुनिया के लिए क्या मतलब है।

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क्या है रुबियो का ‘Civilizational Erasure’ का डर?

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म्यूनिख में रुबियो ने अपने संबोधन में यूरोप को एक भयानक चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि अगर पश्चिमी देश नहीं जागे, तो उन्हें “Civilizational Erasure” (सभ्यता के मिटने) का सामना करना पड़ सकता है। सुनने में यह किसी हॉलीवुड फिल्म का डायलॉग लग सकता है, लेकिन इसके पीछे का संदेश साफ़ था:

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  • अमेरिका अब ‘नियमों पर आधारित व्यवस्था’ (Rules-based order) की परवाह नहीं करता, क्योंकि उनके अनुसार वह व्यवस्था अब अस्तित्व में ही नहीं है।
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  • यह भाषण ‘The Guardian’ और ‘India Today’ जैसे मीडिया आउटलेट्स के अनुसार, यूरोप के लिए एक तरह का अल्टीमेटम था— “या तो हमारे साथ चलो, या फिर मिटने के लिए तैयार रहो।”
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नई ‘East India Company’ का उदय?

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इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू वह तुलना है जो अब दबे-छुपे स्वर में की जा रही है। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, रुबियो का विजन अमेरिका को एक ऐसे सुपरपावर के रूप में पेश करता है जो सहयोग से ज्यादा ‘व्यापारिक मुनाफे’ और ‘वर्चस्व’ पर केंद्रित है।

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जिस तरह East India Company ने व्यापार के बहाने देशों की संप्रभुता (Sovereignty) को कुचला था, वैसे ही अब अमेरिका अपने सहयोगियों पर दबाव बना रहा है। विशेषज्ञ इसे “कॉलोनियल एस्पिरेशन” (औपनिवेशिक आकांक्षा) कह रहे हैं। इसका मतलब साफ़ है:

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  1. यूरोप और अन्य देशों को अपनी सुरक्षा के बदले अमेरिका को भारी कीमत चुकानी होगी।
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  3. आर्थिक नीतियां अब वाशिंगटन में तय होंगी, न कि पेरिस, बर्लिन या ब्रुसेल्स में।
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  5. यह साझेदारी नहीं, बल्कि ‘मालिक और ग्राहक’ का रिश्ता बनाने की कोशिश है।
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यूरोप की घबराहट और दुनिया के लिए संदेश

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जर्मनी के विपक्षी नेता फ्रेडरिक मर्ज (Friedrich Merz) ने भी स्वीकार किया है कि दुनिया का पुराना ‘Rules-based order’ अब खत्म हो चुका है। वहीं, आलोचकों का मानना है कि रुबियो का भाषण यूरोप को आश्वस्त करने वाला (Reassuring) नहीं, बल्कि उन्हें डराने वाला था। अमेरिका अब चीन और रूस के खिलाफ लड़ाई में अपने सहयोगियों से पूर्ण समर्पण चाहता है, ठीक वैसे ही जैसे एक साम्राज्य अपने उपनिवेशों (Colonies) से चाहता था।

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निष्कर्ष: भारत को क्यों रहना होगा सतर्क?

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अगर अमेरिका अपने सबसे पुराने दोस्त यूरोप के साथ ‘East India Company’ जैसा व्यवहार कर सकता है, तो ग्लोबल साउथ और भारत के लिए यह एक खतरे की घंटी है। रुबियो का संदेश साफ़ है— ‘America First’ का मतलब है बाकी सब ‘Second’। आने वाले दिनों में कूटनीति की भाषा बदलने वाली है, और दुनिया को एक नए तरह के अमेरिकी प्रभुत्व के लिए तैयार रहना होगा।

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आपकी राय: क्या आपको लगता है कि अमेरिका अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल कर रहा है? कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं और इस खबर को शेयर करें!

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